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mahabharat 13.3.15-16: ध्रुव तथा ब्रह्मर्षियों (सप्तर्षियों) के बीच उत्तर आकाश में तारा के रूप में सदैव प्रकाशित रहने वाले उत्तानपाद के पुत्र विश्वामित्र क्षत्रिय हुए हैं। हे कुरुपुत्र! उनके इन तथा अन्य अनेक अद्भुत कर्मों का स्मरण करके मुझे यह जानने की जिज्ञासा हुई है कि वे ब्राह्मण कैसे हुए॥15-16॥   |   mahabharat अध्याय 13.3: विश्वामित्रको ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति कैसे हुई—इस विषयमें युधिष्ठिरका प्रश्न   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 3: विश्वामित्रको ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति कैसे हुई—इस विषयमें युधिष्ठिरका प्रश्न  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  13.3.15-16 
ध्रुवस्यौत्तानपादस्य ब्रह्मर्षीणां तथैव च।
मध्यं ज्वल तियो नित्यमुदीचीमाश्रितो दिशम्॥ १५॥
तस्यैतानि च कर्माणि तथान्यानि च कौरव।
क्षत्रियस्येत्यतो जातमिदं कौतूहलं मम॥ १६॥
 
 
अनुवाद
ध्रुव तथा ब्रह्मर्षियों (सप्तर्षियों) के बीच उत्तर आकाश में तारा के रूप में सदैव प्रकाशित रहने वाले उत्तानपाद के पुत्र विश्वामित्र क्षत्रिय हुए हैं। हे कुरुपुत्र! उनके इन तथा अन्य अनेक अद्भुत कर्मों का स्मरण करके मुझे यह जानने की जिज्ञासा हुई है कि वे ब्राह्मण कैसे हुए॥15-16॥
 
Vishwamitra, who always shines in the form of a star in the northern sky among Dhruva and the Brahmarishis (Saptarishis), the son of Uttanapada, has been a Kshatriya. O son of Kuru! Remembering these and many other wonderful deeds of his, I have become curious to know how he became a Brahmin.॥15-16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)