श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 29: ब्राह्मणत्वके लिये तपस्या करनेवाले मतङ्गकी इन्द्रसे बातचीत  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  13.29.13 
अयं तु पापप्रकृतिर्बाले न कुरुते दयाम्।
स्वयोनिं मानयत्येष भावो भावं नियच्छति॥ १३॥
 
 
अनुवाद
वह स्वभाव से ही पापी है, इसीलिए दूसरों की संतानों पर दया नहीं करता। इस पापकर्म से वह अपनी चाण्डाल योनि का ही मान बढ़ा रहा है। जाति स्वभाव ही भावनाओं को नियंत्रित करता है॥13॥
 
He is a sinner by nature; that is why he does not show mercy to other's children. By this evil act he is only increasing the respect of his chandal yoni. It is the caste nature which controls the emotions.॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)