| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 28: श्रीगङ्गाजीके माहात्म्यका वर्णन » श्लोक 94 |
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| | | | श्लोक 13.28.94  | लोकानवेक्ष्य जननीव पुत्रान्
सर्वात्मना सर्वगुणोपपन्नान्।
तत्स्थानकं ब्राह्ममभीप्समानै-
र्गङ्गा सदैवात्मवशैरुपास्या॥ ९४॥ | | | | | | अनुवाद | | जैसे माता अपने पुत्रों को प्रेम भरी दृष्टि से देखती है और उनकी रक्षा करती है, वैसे ही गंगा जी भी अपनी शरण में आए हुए सभी गुणों से संपन्न लोगों को देखती हैं और प्राणपण से उनकी रक्षा करती हैं; इसलिए जो लोग ब्रह्मलोक प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें मन को वश में करके सदैव मातृभाव से गंगाजी की पूजा करनी चाहिए॥94॥ | | | | Just as a mother looks at her sons with loving eyes and protects them, in the same way, Ganga ji looks at the people blessed with all the virtues who have come under her shelter and protects them with all her soul; Therefore, those who wish to attain Brahmalok, they should always worship Gangaji with motherly feelings by controlling their mind. 94॥ | | ✨ ai-generated | | |
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