श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 28: श्रीगङ्गाजीके माहात्म्यका वर्णन  »  श्लोक 83
 
 
श्लोक  13.28.83 
अन्धान् जडान् द्रव्यहीनांश्च गङ्गा
यशस्विनी बृहती विश्वरूपा।
देवै: सेन्द्रैर्मुनिभिर्मानवैश्च
निषेविता सर्वकामैर्युनक्ति॥ ८३॥
 
 
अनुवाद
इन्द्र आदि देवताओं, ऋषियों और मनुष्यों द्वारा सदा पूजित रहने वाली, महिमामयी, विशाल, विश्वव्यापी गंगादेवी, अपनी शरण में आने वाले अंधे, पंगु और दरिद्रों को भी सम्पूर्ण मनोवांछित कामनाएँ प्रदान करती हैं ॥ 83॥
 
The glorious, huge, universal Gangadevi, who is always worshipped by gods like Indra, sages and men, grants all the desired desires to even the blind, the paralyzed and the poor who seek her refuge. ॥ 83॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd