श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 28: श्रीगङ्गाजीके माहात्म्यका वर्णन  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  13.28.66 
न सुतैर्न च वित्तेन कर्मणा न च तत्फलम्।
प्राप्नुयात् पुरुषोऽत्यन्तं गङ्गां प्राप्य यदाप्नुयात्॥ ६६॥
 
 
अनुवाद
गंगास्नान करने से मनुष्य को जो अक्षय फल मिलता है, वह पुत्र, धन या अन्य किसी कर्म से नहीं मिलता ॥66॥
 
The everlasting fruit which a man gets by bathing in the Ganges cannot be obtained through sons, wealth or any other deed. ॥ 66॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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