श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 28: श्रीगङ्गाजीके माहात्म्यका वर्णन  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  13.28.54 
जाह्नवीपुलिनोत्थाभि: सिकताभि: समुक्षितम्।
आत्मानं मन्यते लोको दिविष्ठमिव शोभितम्॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
ज्ञानी पुरुष गंगा तट से उड़ाई गई बालू के कणों से अभिषिक्त अपने शरीर को स्वर्ग के समान सुन्दर समझता है ॥54॥
 
A wise man considers his body, anointed with the grains of sand blown from the banks of the Ganges, as beautiful as being in heaven. ॥ 54॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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