श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 28: श्रीगङ्गाजीके माहात्म्यका वर्णन  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  13.28.49 
यथा सुराणाममृतं पितॄणां च यथा स्वधा।
सुधा यथा च नागानां तथा गङ्गाजलं नृणाम्॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
जैसे अमृत देवताओं को, स्वधा पितरों को और अमृत सर्पों को तृप्त करता है, वैसे ही मनुष्यों के लिए गंगाजल ही पूर्ण तृप्ति का एकमात्र साधन है ॥ 49॥
 
Just as nectar satisfies the gods, Swadha satisfies the ancestors and nectar satisfies the serpents, similarly, the water of the Ganges is the only means of complete satisfaction for humans. ॥ 49॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)