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श्लोक 13.28.33  |
अपहत्य तमस्तीव्रं यथा भात्युदये रवि:।
तथापहत्य पाप्मानं भाति गङ्गाजलोक्षित:॥ ३३॥ |
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| अनुवाद |
| जैसे सूर्योदय के समय सूर्य अंधकार को चीरकर अपना प्रकाश देता है, वैसे ही गंगाजल में स्नान करने वाला मनुष्य अपने पापों का नाश करके शोभायमान हो जाता है ॥33॥ |
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| Just as the sun at sunrise pierces the darkness and gives its light, similarly a person bathing in the water of the Ganges destroys his sins and becomes adorned. ॥ 33॥ |
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