|
| |
| |
श्लोक 13.28.102  |
भीष्म उवाच
इति परममतिर्गुणानशेषान्
शिलरतये त्रिपथानुयोगरूपान्।
बहुविधमनुशास्य तथ्यरूपान्
गगनतलं द्युतिमान् विवेश सिद्ध:॥ १०२॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर ! उस परम तेजस्वी एवं सिद्ध शिलोच्चवृत्ति से जीविका चलाने वाले ब्राह्मण को त्रिपथ गंगा के उपर्युक्त समस्त वास्तविक गुणों का अनेक प्रकार से वर्णन करके वे आकाश में चले गए ॥102॥ |
| |
| Bhishmaji says – Yudhishthir! After describing in various ways all the above mentioned real qualities of Tripatha Ganga to that Brahmin who earns his living by the supremely brilliant and proven Shilonchvritti, he entered the sky. 102॥ |
| ✨ ai-generated |
| |
|