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श्री महाभारत
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पर्व 13: अनुशासन पर्व
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अध्याय 27: विभिन्न तीर्थोंके माहात्म्यका वर्णन
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श्लोक 55
श्लोक
13.27.55
उज्जानक उपस्पृश्य आर्ष्टिषेणस्य चाश्रमे।
पिङ्गायाश्चाश्रमे स्नात्वा सर्वपापै: प्रमुच्यते॥ ५५॥
अनुवाद
उज्जनक तीर्थ में स्नान करने से तथा अष्टिसेण आश्रम और पिङ्गा आश्रम में डुबकी लगाने से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है ॥ 55॥
By bathing in Ujjanaka Tirtha and taking a dip in the Ashtishena Ashram and Pingaga Ashram, a man is freed from all sins. ॥ 55॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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