पुनरावर्तनन्दां च महानन्दां च सेव्य वै।
नन्दने सेव्यते दान्तस्त्वप्सरोभिरहिंसक:॥ ४५॥
अनुवाद
जो समस्त प्रकार की हिंसा का त्याग करके जितेन्द्रिय भाव से आवर्तानंद और महानंद तीर्थ का सेवन करता है, उसी की स्वर्ग रूपी नंदनवन में अप्सराएँ सेवा करती हैं ॥45॥
Apsaras serve him in the heavenly Nandanvan, who, renouncing all forms of violence, consumes Avartananda and Mahananda Tirtha with Jitendriya Bhava. 45॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥