श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 27: विभिन्न तीर्थोंके माहात्म्यका वर्णन  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  13.27.43 
कलविङ्क उपस्पृश्य विद्याच्च बहुशो जलम्।
अग्ने: पुरे नर: स्नात्वा अग्निकन्यापुरे वसेत्॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
काल्विंक तीर्थ में स्नान करने से अनेक तीर्थों में स्नान करने का फल मिलता है। अग्निपुर तीर्थ में स्नान करने से अग्निकन्यापुर धाम की प्राप्ति होती है ॥43॥
 
Taking bath in Kalvinka Tirtha gives the result of taking a dip in many Tirthas. By taking bath in Agnipur Tirtha, one attains the abode of Agnikanyapur. 43॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)