vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 13: अनुशासन पर्व
»
अध्याय 27: विभिन्न तीर्थोंके माहात्म्यका वर्णन
»
श्लोक 41
श्लोक
13.27.41
उत्पातके नर: स्नात्वा अष्टावक्रे कृतोदक:।
द्वादशाहं निराहारो नरमेधफलं लभेत्॥ ४१॥
अनुवाद
उत्पातक तीर्थ में स्नान करने, अष्टावक्र तीर्थ में तर्पण करने तथा बारह दिन तक उपवास करने से मनुष्य नरमेध्ययज्ञ का फल प्राप्त करता है ॥41॥
By taking bath in Utpatak Tirtha and offering tarpan in Ashtavakra Tirtha and fasting for twelve days, one gets the results of Naramedhyajna. 41॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×