श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 25: देवता और पितरोंके कार्यमें निमन्त्रण देने योग्य पात्रों तथा नरकगामी और स्वर्गगामी मनुष्योंके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  13.25.58 
तपस्विनस्तपोनिष्ठास्तेषां भैक्षचराश्च ये।
अर्थिन: किञ्चिदिच्छन्ति तेषु दत्तं महाफलम्॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
जो तपस्वी और तपस्या में तत्पर हैं तथा तपस्वियों के लिए ही भिक्षा मांगते हैं, ऐसे भिखारी यदि कुछ चाहते हैं तो उन्हें दिया गया दान बहुत फलदायी होता है ॥58॥
 
Those who are ascetics and devoted to penance and beg for alms only for the ascetics, if such beggars want something then the donation given to them is very fruitful. ॥ 58॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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