श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 25: देवता और पितरोंके कार्यमें निमन्त्रण देने योग्य पात्रों तथा नरकगामी और स्वर्गगामी मनुष्योंके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  13.25.53 
अकल्ककस्य विप्रस्य रौक्ष्यात् करकृतात्मन:।
वटवो यस्य भिक्षन्ति तेभ्यो दत्तं महाफलम्॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
जिसके मन में किसी प्रकार का छल-कपट नहीं है और जिसके दरिद्र होने पर भी भोजन हाथ में आते ही उसके भूखे बच्चे 'मुझे दे दो, मुझे दे दो' कहकर उसे मांगने लगते हैं; ऐसे दरिद्र ब्राह्मण और उसके बच्चों को दिया गया दान बहुत फलदायी होता है ॥ 53॥
 
In whose mind there is no deceit of any kind, and in whose poverty as soon as food comes into his hands his hungry children start begging for it saying, 'Give it to me, give it to me'; charity given to such a poor Brahmin and his children is very fruitful. ॥ 53॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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