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श्लोक 13.25.48  |
युधिष्ठिर उवाच
पित्र्यं वाप्यथवा दैवं दीयते यत् पितामह।
एतदिच्छाम्यहं ज्ञातुं दत्तं केषु महाफलम्॥ ४८॥ |
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| अनुवाद |
| युधिष्ठिर ने पूछा - पितामह ! देवयज्ञ या श्राद्धकर्म में दिया गया दान मनुष्यों को किस प्रकार उत्तम फल देता है ? मैं यह बात जानना चाहता हूँ ॥48॥ |
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| Yudhishthir asked – Grandfather! How does the donation given in a Devyagya or Shraddha ritual bring great results to men? I want to know this thing. 48॥ |
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