श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 25: देवता और पितरोंके कार्यमें निमन्त्रण देने योग्य पात्रों तथा नरकगामी और स्वर्गगामी मनुष्योंके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  13.25.46 
अर्थेनान्येन यो लिप्सेत् कर्मार्थं चैव भारत।
आमन्त्रयति राजेन्द्र तस्याधर्मोऽनृतं स्मृतम्॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
भरतनन्दन! राजेन्द्र! जो तीर्थयात्रा या अन्य किसी प्रयोजन के बहाने जीविका के लिए धन मांगता है अथवा जो 'मुझे अमुक अनुष्ठान (यज्ञ आदि) करने के लिए धन दीजिए' कहकर दाता को अपनी ओर मोड़ता है, उसके लिए भी वही झूठी शपथ लेने का पाप कहा गया है ॥ 46॥
 
Bharatanandan! Rajendra! One who asks for money for his livelihood on the pretext of going on a pilgrimage or some other purpose or one who turns the donor towards himself by saying, 'Give me money to perform a certain ritual (sacrifice etc.), the same sin of taking a false oath has been stated for him also. ॥ 46॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd