श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 25: देवता और पितरोंके कार्यमें निमन्त्रण देने योग्य पात्रों तथा नरकगामी और स्वर्गगामी मनुष्योंके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  13.25.43 
तथा राजन्यवैश्याभ्यां यद्यश्नीयात्तु केतित:।
यवीयान् पशुहिंसायां भागार्धं समवाप्नुयात्॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
यदि किसी क्षत्रिय या वैश्य ने उसे पहले ही आमंत्रित कर लिया हो और वह अन्यत्र भोजन करने चला जाए, तो वह हीन माने जाने के साथ-साथ पशु-हत्या के आधे पाप का भी भागी बनता है ॥ 43॥
 
If a Kshatriya or a Vaishya has already invited him and he goes somewhere else to eat, then besides being considered inferior, he also becomes a party to half the sin of killing an animal. ॥ 43॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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