श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 25: देवता और पितरोंके कार्यमें निमन्त्रण देने योग्य पात्रों तथा नरकगामी और स्वर्गगामी मनुष्योंके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  13.25.30 
अव्रती कितव: स्तेन: प्राणिविक्रयिको वणिक्।
पश्चाच्च पीतवान् सोमं स राजन् केतनक्षम:॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
राजन! जो व्रत नहीं करता, धूर्त है, चोर है, पशुओं का क्रय-विक्रय करता है तथा व्यापार करके जीविका चलाता है, फिर भी यज्ञ का अनुष्ठान कर चुका है और उसमें सोमरस का सेवन कर चुका है, वह भी निमंत्रण पाने का अधिकारी है ॥30॥
 
Rajan! The one who does not fast, is cunning, a thief, one who buys and sells animals and earns his living by trading, yet has performed the rituals of Yagya and has consumed Somra in it, he is also entitled to receive the invitation. 30॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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