एतदुक्तममुत्रार्थं दैवं पित्र्यं च भारत।
दानधर्मं च दानस्य यत् पूर्वमृषिभि: कृतम्॥ १०३॥
अनुवाद
हे भारत! मैंने तुम्हें देवताओं और पितरों के कर्मों का वर्णन किया है, जो परलोक में कल्याणकारी हैं। मैंने प्राचीनकाल में ऋषियों द्वारा कहे गए दान-पुण्य के गुणों का भी वर्णन किया है॥103॥
O Bharata! I have narrated to you the deeds of the gods and the ancestors which bring welfare in the next world. I have also explained the virtues of charity and donations as told by the sages in ancient times.॥ 103॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि स्वर्गनरकगामिवर्णने त्रयोविंशोऽध्याय:॥ २३॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें स्वर्ग और नरकमें जानेवालोंका वर्णनविषयक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ८ १/२ श्लोक मिलाकर कुल १११ १/२ श्लोक हैं)
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥