श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 25: देवता और पितरोंके कार्यमें निमन्त्रण देने योग्य पात्रों तथा नरकगामी और स्वर्गगामी मनुष्योंके लक्षणोंका वर्णन  »  श्लोक 103
 
 
श्लोक  13.25.103 
एतदुक्तममुत्रार्थं दैवं पित्र्यं च भारत।
दानधर्मं च दानस्य यत् पूर्वमृषिभि: कृतम्॥ १०३॥
 
 
अनुवाद
हे भारत! मैंने तुम्हें देवताओं और पितरों के कर्मों का वर्णन किया है, जो परलोक में कल्याणकारी हैं। मैंने प्राचीनकाल में ऋषियों द्वारा कहे गए दान-पुण्य के गुणों का भी वर्णन किया है॥103॥
 
O Bharata! I have narrated to you the deeds of the gods and the ancestors which bring welfare in the next world. I have also explained the virtues of charity and donations as told by the sages in ancient times.॥ 103॥
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि स्वर्गनरकगामिवर्णने त्रयोविंशोऽध्याय:॥ २३॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें स्वर्ग और नरकमें जानेवालोंका वर्णनविषयक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ८ १/२ श्लोक मिलाकर कुल १११ १/२ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)