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mahabharat 13.24.36: ऋषिगण उस श्रेष्ठ ब्राह्मण को दान का सर्वश्रेष्ठ पात्र मानते हैं जो चारों वेदों का उनके अंगों सहित अध्ययन करता है तथा ब्राह्मण के योग्य छः कर्मों (अध्ययन-अध्यापन, यज्ञ-यज्ञ तथा दान-दक्षिणा ग्रहण करना) में संलग्न रहता है।   |   mahabharat अध्याय 13.24: युधिष्ठिरके विविध धर्मयुक्त प्रश्नोंका उत्तर तथा श्राद्ध और दानके उत्तम पात्रोंका लक्षण   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 24: युधिष्ठिरके विविध धर्मयुक्त प्रश्नोंका उत्तर तथा श्राद्ध और दानके उत्तम पात्रोंका लक्षण  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  13.24.36 
साङ्गांश्च चतुरो वेदानधीते यो द्विजर्षभ:।
षड्भ्य: प्रवृत्त: कर्मभ्यस्तं पात्रमृषयो विदु:॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
ऋषिगण उस श्रेष्ठ ब्राह्मण को दान का सर्वश्रेष्ठ पात्र मानते हैं जो चारों वेदों का उनके अंगों सहित अध्ययन करता है तथा ब्राह्मण के योग्य छः कर्मों (अध्ययन-अध्यापन, यज्ञ-यज्ञ तथा दान-दक्षिणा ग्रहण करना) में संलग्न रहता है।
 
The sages consider a great Brahmin who studies the four Vedas along with their parts and is engaged in the six duties befitting a Brahmin (study-teaching, offering of prayers-sacrifices and receiving gifts of charity) to be the best recipient of charity.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)