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mahabharat 13.24.2: भीष्म बोले, "महाराज! ऐसा कहा गया है कि जो ब्राह्मण अपने जीवन के लिए वर्ण-श्रम-योग्य धर्म का आश्रय ले चुका है, उसे, चाहे वह चिन्हित हो या अचिन्हित, भिक्षा देना उचित है; क्योंकि वे दोनों ही अपने-अपने धर्म का आश्रय लेने वाले तपस्वी और भिक्षा लेने वाले हैं॥ 2॥   |   mahabharat अध्याय 13.24: युधिष्ठिरके विविध धर्मयुक्त प्रश्नोंका उत्तर तथा श्राद्ध और दानके उत्तम पात्रोंका लक्षण   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.24.2 
भीष्म उवाच
स्ववृत्तिमभिपन्नाय लिङ्गिने चेतराय च।
देयमाहुर्महाराज उभावेतौ तपस्विनौ॥ २॥
 
 
अनुवाद
भीष्म बोले, "महाराज! ऐसा कहा गया है कि जो ब्राह्मण अपने जीवन के लिए वर्ण-श्रम-योग्य धर्म का आश्रय ले चुका है, उसे, चाहे वह चिन्हित हो या अचिन्हित, भिक्षा देना उचित है; क्योंकि वे दोनों ही अपने-अपने धर्म का आश्रय लेने वाले तपस्वी और भिक्षा लेने वाले हैं॥ 2॥
 
Bhishma said, "Maharaj! It is said that it is appropriate to give alms to any Brahmin, whether marked or unmarked, who has taken refuge in his Varna-Shram-appropriate profession for the sake of his life; because both of them, who have taken refuge in their own Dharma, are ascetics and are recipients of alms.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)