Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.23.d12: मार्कण्डेय बोले, "प्रत्येक युग के बीतने पर धर्म की मर्यादा नष्ट हो जाती है। तब यदि मैं धर्म के नाम पर अधर्म करूँ, तो मुझे उस धर्म का फल कैसे मिलेगा? यही प्रश्न मेरे मन में उठता है।" | mahabharat अध्याय 13.23: मार्कण्डेयजीके द्वारा विविध प्रश्न और नारदजीके द्वारा उनका उत्तर । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
मार्कण्डेय उवाच
युगे युगे व्यतीतेऽस्मिन् धर्मसेतु: प्रणश्यति।
कथं धर्मच्छलेनाहं प्राप्नुयामिति मे मति:॥
अनुवाद
मार्कण्डेय बोले, "प्रत्येक युग के बीतने पर धर्म की मर्यादा नष्ट हो जाती है। तब यदि मैं धर्म के नाम पर अधर्म करूँ, तो मुझे उस धर्म का फल कैसे मिलेगा? यही प्रश्न मेरे मन में उठता है।"
Markandeya said, "After the passing of each Yuga, the dignity of Dharma gets destroyed. Then, if I commit Adharma in the name of Dharma, how can I get the fruits of that Dharma? This is the question that arises in my mind."
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥