श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 22: अष्टावक्र और उत्तरदिशाका संवाद, अष्टावक्रका अपने घर लौटकर वदान्य ऋषिकी कन्याके साथ विवाह करना  »  श्लोक d1
 
 
श्लोक  13.22.d1 
(अविश्वासान्न व्यसनी नातिसक्तोऽप्रवासक:।
विद्वान् सुशील: पुरुष: सदार: सुखमश्नुते॥ )
 
 
अनुवाद
जो किसी भी वस्तु में विश्वास नहीं करता, किसी भी दुर्गुण में नहीं फँसता, किसी वस्तु में आसक्त नहीं होता, परदेश में नहीं रहता, विद्वान् एवं सदाचारी है, वही पुरुष स्त्री के साथ रहकर सुख भोगता है।
 
He who does not believe in anything and does not get entangled in any vice, does not get attached to anything, does not live in a foreign land and is learned and well behaved, only that man enjoys happiness while living with a woman.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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