श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 22: अष्टावक्र और उत्तरदिशाका संवाद, अष्टावक्रका अपने घर लौटकर वदान्य ऋषिकी कन्याके साथ विवाह करना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  13.22.19 
कन्यां तां प्रतिगृह्यैव भार्यां परमशोभनाम्।
उवास मुदितस्तत्र स्वाश्रमे विगतज्वर:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
उस अत्यन्त सुन्दरी कन्या को पत्नी रूप में पाकर अष्टावक्र ऋषि की सारी चिन्ताएँ दूर हो गईं और वे उसके साथ अपने आश्रम में सुखपूर्वक रहने लगे॥ 19॥
 
Having received that extremely beautiful girl as his wife, all the worries of the sage Aṣṭāvakra were dispelled and he began to live happily with her in his hermitage.॥ 19॥
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अष्टावक्रदिक्संवादे एकविंशोऽध्याय:॥ २१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें अष्टावक्र और उत्तरदिशाका संवादविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २१॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २० श्लोक हैं)
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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