Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.21.19: मैं सत्य कहता हूँ, आप मुझमें कोई दोष नहीं पाएँगे। कृपया मुझे स्वतंत्र मानिए। इसमें जो पाप हो, वह मेरा ही दोष हो। मेरा मन आपके चिंतन में लगा हुआ है। मैं स्वतंत्र हूँ, अतः कृपया मुझे स्वीकार कीजिए॥19॥ | mahabharat अध्याय 13.21: अष्टावक्र और उत्तर दिशाका संवाद । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
न दोषो भविता चैव सत्येनैतद् ब्रवीम्यहम्।
स्वतन्त्रां मां विजानीहि योऽधर्म: सोऽस्तु वै मयि।
त्वय्यावेशितचित्ता च स्वतन्त्रास्मि भजस्व माम्॥ १९॥
अनुवाद
मैं सत्य कहता हूँ, आप मुझमें कोई दोष नहीं पाएँगे। कृपया मुझे स्वतंत्र मानिए। इसमें जो पाप हो, वह मेरा ही दोष हो। मेरा मन आपके चिंतन में लगा हुआ है। मैं स्वतंत्र हूँ, अतः कृपया मुझे स्वीकार कीजिए॥19॥
I am telling the truth, you will not find fault with me. Please consider me independent. The sin that is committed in this should be my fault. My mind is focused on thinking about you. I am independent; hence please accept me.॥19॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥