Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 13.21.16: अष्टावक्र बोले, "भद्र! सभी प्रकार के पाप स्वेच्छाचारी लोगों को आकर्षित करते हैं। मैं सदैव धैर्य के साथ अपने मन को वश में रखता हूँ; अतः तुम अपने शयन-शयन पर लौट जाओ।"   |   mahabharat अध्याय 13.21: अष्टावक्र और उत्तर दिशाका संवाद   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 21: अष्टावक्र और उत्तर दिशाका संवाद  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  13.21.16 
अष्टावक्र उवाच
हरन्ति दोषजातानि नरं जातं यथेच्छकम्।
प्रभवामि सदा धृत्या भद्रे स्वशयनं व्रज॥ १६॥
 
 
अनुवाद
अष्टावक्र बोले, "भद्र! सभी प्रकार के पाप स्वेच्छाचारी लोगों को आकर्षित करते हैं। मैं सदैव धैर्य के साथ अपने मन को वश में रखता हूँ; अतः तुम अपने शयन-शयन पर लौट जाओ।"
 
Ashtavakra said, "Bhadra! All kinds of sins attract the willful people. I always control my mind with patience; hence you go back to your bed.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)