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mahabharat 13.20.99: जहाँ कहीं भी महान ब्राह्मण अष्टावक्र उसे देखते थे, उनकी दृष्टि उन्हें प्रसन्न नहीं करती थी, बल्कि वे उसकी सुंदरता से विमुख हो जाते थे।   |   mahabharat अध्याय 13.20: अष्टावक्र मुनिका वदान्य ऋषिके कहनेसे उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान, मार्गमें कुबेरके द्वारा उनका स्वागत तथा स्त्रीरूपधारिणी उत्तरदिशाके साथ उनका संवाद   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 20: अष्टावक्र मुनिका वदान्य ऋषिके कहनेसे उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान, मार्गमें कुबेरके द्वारा उनका स्वागत तथा स्त्रीरूपधारिणी उत्तरदिशाके साथ उनका संवाद  »  श्लोक 99
 
 
श्लोक  13.20.99 
यद् यदङ्गं हि सोऽपश्यत् तस्या विप्रर्षभस्तदा।
नारमत् तत्र तत्रास्य दृष्टी रूपविरागिता॥ ९९॥
 
 
अनुवाद
जहाँ कहीं भी महान ब्राह्मण अष्टावक्र उसे देखते थे, उनकी दृष्टि उन्हें प्रसन्न नहीं करती थी, बल्कि वे उसकी सुंदरता से विमुख हो जाते थे।
 
Wherever the great Brahmin Aṣṭāvakra saw her, his sight did not please him; instead he became averse to her beauty.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)