श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 20: अष्टावक्र मुनिका वदान्य ऋषिके कहनेसे उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान, मार्गमें कुबेरके द्वारा उनका स्वागत तथा स्त्रीरूपधारिणी उत्तरदिशाके साथ उनका संवाद  »  श्लोक 95
 
 
श्लोक  13.20.95 
भीष्म उवाच
तत: स ऋषिरेकाग्रस्तां स्त्रियं प्रत्यभाषत।
आस्यतां रुचितश्छन्द: किं च कार्यं ब्रवीहि मे॥ ९५॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी कहते हैं - राजन ! तब ऋषि ने एकाग्रचित्त होकर उस स्त्री से कहा - 'चुप हो जाओ । जब मन में भोग की इच्छा होती है, तब वह मनमानापन करने लगता है । मेरी रुचि नहीं है, इसलिए मैं यह कार्य नहीं कर सकता । इसके अतिरिक्त यदि मुझे कोई और कार्य करना हो, तो मुझे बताओ ॥ 95 ॥
 
Bhishmaji says - King! Then the sage, concentrating, said to the woman - 'Be quiet. When the mind has a desire for pleasure, it leads to arbitrariness. I am not interested, so I cannot do this work. Apart from this, if I have any work to do, then tell me'॥ 95॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)