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श्री महाभारत
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पर्व 13: अनुशासन पर्व
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अध्याय 20: अष्टावक्र मुनिका वदान्य ऋषिके कहनेसे उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान, मार्गमें कुबेरके द्वारा उनका स्वागत तथा स्त्रीरूपधारिणी उत्तरदिशाके साथ उनका संवाद
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श्लोक 85
श्लोक
13.20.85
रमणीये वने विप्र सर्वकामफलप्रदे।
त्वद्वशाहं भविष्यामि रंस्यसे च मया सह॥ ८५॥
अनुवाद
हे ब्रह्मन्! मैं इस सुन्दर वन में, जो समस्त मनोवांछित फल प्रदान करता है, आपके अधीन रहूँगा। आप मेरे साथ भोग करें।
Brahman! I will live under your control in this beautiful forest which gives all the desired fruits. Please enjoy with me. 85.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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