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mahabharat 13.20.8: पितामह! मैं इस विषय पर जितना अधिक विचार करता हूँ, उतना ही यह समझना कठिन प्रतीत होता है। अतः आप इस विषय में जो भी श्रुतिक नियम हैं, उनके अनुसार मुझे यह सब समझाने की कृपा करें, जिससे मेरा संदेह दूर हो जाए। ॥8॥   |   mahabharat अध्याय 13.20: अष्टावक्र मुनिका वदान्य ऋषिके कहनेसे उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान, मार्गमें कुबेरके द्वारा उनका स्वागत तथा स्त्रीरूपधारिणी उत्तरदिशाके साथ उनका संवाद   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 20: अष्टावक्र मुनिका वदान्य ऋषिके कहनेसे उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान, मार्गमें कुबेरके द्वारा उनका स्वागत तथा स्त्रीरूपधारिणी उत्तरदिशाके साथ उनका संवाद  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  13.20.8 
गह्वरं प्रतिभात्येतन्मम चिन्तयतोऽनिशम्।
नि:संदेहमिदं सर्वं पितामह यथाश्रुति॥ ८॥
 
 
अनुवाद
पितामह! मैं इस विषय पर जितना अधिक विचार करता हूँ, उतना ही यह समझना कठिन प्रतीत होता है। अतः आप इस विषय में जो भी श्रुतिक नियम हैं, उनके अनुसार मुझे यह सब समझाने की कृपा करें, जिससे मेरा संदेह दूर हो जाए। ॥8॥
 
Grandfather! The more I think about this matter, the more it seems very difficult to understand. So please explain all this to me according to whatever Shrutika rules there are in this matter so that my doubts are dispelled. ॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)