श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 20: अष्टावक्र मुनिका वदान्य ऋषिके कहनेसे उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान, मार्गमें कुबेरके द्वारा उनका स्वागत तथा स्त्रीरूपधारिणी उत्तरदिशाके साथ उनका संवाद  »  श्लोक 75-76h
 
 
श्लोक  13.20.75-76h 
अथ तां संविशन् प्राह शयने भास्वरे तदा॥ ७५॥
त्वयापि सुप्यतां भद्रे रजनी ह्यतिवर्तते।
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात्, उज्ज्वल एवं प्रकाशमान शय्या पर शयन करते हुए मुनि ने वृद्धा से कहा - 'भद्रे! अब तुम भी सो जाओ। रात्रि का बहुत समय बीत चुका है।' 75 1/2॥
 
Thereafter, the sage, sleeping on a bright and luminous bed, said to the old woman – 'Bhadre! Now you also sleep. Much of the night has passed. 75 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)