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mahabharat 13.20.64-65: उस आश्रम के चारों ओर विचित्र रत्नजटित मेहराबों से सुसज्जित, मोतियों की झालरों से सुसज्जित तथा रत्नों और बहुमूल्य रत्नों से अलंकृत सुन्दर भवन शोभायमान हो रहे थे। वे मन को मोहित करने वाले और नेत्रों को आकर्षित करने वाले थे। उन शुभ भवनों से घिरा हुआ तथा ऋषि-मुनियों से युक्त वह आश्रम अत्यंत शोभायमान हो रहा था।   |   mahabharat अध्याय 13.20: अष्टावक्र मुनिका वदान्य ऋषिके कहनेसे उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान, मार्गमें कुबेरके द्वारा उनका स्वागत तथा स्त्रीरूपधारिणी उत्तरदिशाके साथ उनका संवाद   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 20: अष्टावक्र मुनिका वदान्य ऋषिके कहनेसे उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान, मार्गमें कुबेरके द्वारा उनका स्वागत तथा स्त्रीरूपधारिणी उत्तरदिशाके साथ उनका संवाद  »  श्लोक 64-65
 
 
श्लोक  13.20.64-65 
नानाविधैश्च भवनैर्विचित्रमणितोरणै:।
मुक्ताजालविनिक्षिप्तैर्मणिरत्नविभूषितै:॥ ६४॥
मनोदृष्टिहरै रम्यै: सर्वत: संवृतं शुभै:।
ऋषिभिश्चावृतं तत्र आश्रमं तं मनोहरम्॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
उस आश्रम के चारों ओर विचित्र रत्नजटित मेहराबों से सुसज्जित, मोतियों की झालरों से सुसज्जित तथा रत्नों और बहुमूल्य रत्नों से अलंकृत सुन्दर भवन शोभायमान हो रहे थे। वे मन को मोहित करने वाले और नेत्रों को आकर्षित करने वाले थे। उन शुभ भवनों से घिरा हुआ तथा ऋषि-मुनियों से युक्त वह आश्रम अत्यंत शोभायमान हो रहा था।
 
All around that ashram, beautiful buildings decorated with strange jeweled arches, adorned with pearl fringes and decorated with gems and precious stones were looking beautiful. They were captivating to the mind and attracted the eyes. Surrounded by those auspicious buildings and filled with sages and saints, that ashram looked very beautiful. 64-65.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)