श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 20: अष्टावक्र मुनिका वदान्य ऋषिके कहनेसे उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान, मार्गमें कुबेरके द्वारा उनका स्वागत तथा स्त्रीरूपधारिणी उत्तरदिशाके साथ उनका संवाद  »  श्लोक 52-53
 
 
श्लोक  13.20.52-53 
प्रीतोऽस्मि सदृशं चैव तव सर्वं धनाधिप।
तव प्रसादाद् भगवन् महर्षेश्च महात्मन:॥ ५२॥
नियोगादद्य यास्यामि वृद्धिमानृद्धिमान् भव।
अथ निष्क्रम्य भगवान‍् प्रययावुत्तरामुख:॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
धनाधिप! मैं बहुत प्रसन्न हूँ। आपकी सारी बातें आपके अनुरूप हैं। भगवन्! अब आपकी कृपा से मैं उन महर्षि वदान्य की आज्ञा के अनुसार आगे बढ़ूँगा। आप समृद्ध हों और आपकी उन्नति हो।' ऐसा कहकर भगवान अष्टावक्र उत्तर दिशा की ओर मुख करके चल पड़े। 52-53।
 
Dhanadhipa! I am very happy. All your words are in accordance with you. Bhagwan! Now with your grace I will proceed further as per the orders of that great sage Vadanya. May you prosper and be prosperous.' Saying this, Bhagwan Ashtavakra started walking facing the north direction. 52-53.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)