श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 20: अष्टावक्र मुनिका वदान्य ऋषिके कहनेसे उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान, मार्गमें कुबेरके द्वारा उनका स्वागत तथा स्त्रीरूपधारिणी उत्तरदिशाके साथ उनका संवाद  »  श्लोक 44-46
 
 
श्लोक  13.20.44-46 
अथोर्वरा मिश्रकेशी रम्भा चैवोर्वशी तथा।
अलम्बुषा घृताची च चित्रा चित्राङ्गदा रुचि:॥ ४४॥
मनोहरा सुकेशी च सुमुखी हासिनी प्रभा।
विद्युता प्रशमी दान्ता विद्योता रतिरेव च॥ ४५॥
एताश्चान्याश्च वै वह्वॺ: प्रनृत्ताप्सरस: शुभा:।
अवादयंश्च गन्धर्वा वाद्यानि विविधानि च॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद उर्वरा, मिश्रकेशी, रम्भा, उर्वशी, अलम्बुषा, घृताची, चित्रा, चित्रांगदा, रुचि, मनोहरा, सुकेशी, सुमुखी, हासिनी, प्रभा, विद्युत, प्रशमी, दंता, विद्योता और रति तथा अन्य कई शुभ अप्सराएँ नृत्य करने लगीं और गंधर्व विभिन्न प्रकार के वाद्ययंत्र बजाने लगे। 44-46॥
 
Thereafter, Urvara, Mishrakeshi, Rambha, Urvashi, Alambusha, Ghritachi, Chitra, Chitrangada, Ruchi, Manohara, Sukeshi, Sumukhi, Hasini, Prabha, Vidyut, Prashmi, Danta, Vidyota and Rati and many other auspicious nymphs started dancing and the Gandharvas started playing different types of musical instruments. 44-46॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)