श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 20: अष्टावक्र मुनिका वदान्य ऋषिके कहनेसे उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान, मार्गमें कुबेरके द्वारा उनका स्वागत तथा स्त्रीरूपधारिणी उत्तरदिशाके साथ उनका संवाद  »  श्लोक 100
 
 
श्लोक  13.20.100 
देवतेयं गृहस्यास्य शापात् किं नु विरूपिता।
अस्याश्च कारणं वेत्तुं न युक्तं सहसा मया॥ १००॥
 
 
अनुवाद
वह सोचने लगा, 'यह स्त्री इस घर की अधिष्ठात्री देवी है। फिर इसे इतनी कुरूप किसने बनाया? इसकी कुरूपता का कारण क्या है? क्या इसे किसी ने शाप दिया है? मुझे अचानक इसकी कुरूपता का कारण जानने का प्रयत्न करना उचित नहीं है॥100॥
 
He started thinking, 'This woman is the presiding deity of this house. Then who made her so ugly? What is the reason for her ugliness? Has she been cursed by someone? It is not right for me to suddenly try to find out the reason for her ugliness.'॥100॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)