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mahabharat 13.2.93: जो गृहस्थ सुयोग्य एवं शिष्ट अतिथि का उचित रीति से स्वागत नहीं करता, वह उसे पाप देकर उसके पुण्यों को अपने साथ ले जाता है ॥93॥   |   mahabharat अध्याय 13.2: प्रजापति मनुके वंशका वर्णन, अग्निपुत्र सुदर्शनका अतिथिसत्काररूपी धर्मके पालनसे मृत्युपर विजय पाना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 2: प्रजापति मनुके वंशका वर्णन, अग्निपुत्र सुदर्शनका अतिथिसत्काररूपी धर्मके पालनसे मृत्युपर विजय पाना  »  श्लोक 93
 
 
श्लोक  13.2.93 
पात्रं त्वतिथिमासाद्य शीलाढ्यं यो न पूजयेत्।
स दत्त्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति॥ ९३॥
 
 
अनुवाद
जो गृहस्थ सुयोग्य एवं शिष्ट अतिथि का उचित रीति से स्वागत नहीं करता, वह उसे पाप देकर उसके पुण्यों को अपने साथ ले जाता है ॥93॥
 
A householder who does not welcome a worthy and well behaved guest in the proper manner, gives him his sins and goes away taking his virtues with him. ॥93॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)