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श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 2: प्रजापति मनुके वंशका वर्णन, अग्निपुत्र सुदर्शनका अतिथिसत्काररूपी धर्मके पालनसे मृत्युपर विजय पाना  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  13.2.68 
सुदर्शनस्तु मनसा कर्मणा चक्षुषा गिरा।
त्यक्तेर्ष्यस्त्यक्तमन्युश्च स्मयमानोऽब्रवीदिदम्॥ ६८॥
 
 
अनुवाद
परंतु सुदर्शन ने मन, वाणी, नेत्र और कर्म से ईर्ष्या और क्रोध को त्याग दिया था। वे मुस्कुराते हुए इस प्रकार बोले-॥68॥
 
But Sudarshan had given up jealousy and anger from his mind, speech, eyes and actions. He spoke smilingly as follows -॥ 68॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)