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श्लोक  13.2.67 
कूटमुद्‍गरहस्तस्तु मृत्युस्तं वै समन्वगात्।
हीनप्रतिज्ञमत्रैनं वधिष्यामीति चिन्तयन्॥ ६७॥
 
 
अनुवाद
तभी मृत्यु हाथ में दंड लेकर सुदर्शन के पीछे आकर खड़ी हो गई। उसने सोचा कि अब यह अपनी प्रतिज्ञा भंग करेगा। अतः मैं इसे यहीं मार डालूँगी।
 
At this time, Mrityu came and stood behind Sudarshan with a rod in her hand. She thought that now he will break his vow. So I will kill him right here. 67.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)