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श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 2: प्रजापति मनुके वंशका वर्णन, अग्निपुत्र सुदर्शनका अतिथिसत्काररूपी धर्मके पालनसे मृत्युपर विजय पाना  »  श्लोक 60-61
 
 
श्लोक  13.2.60-61 
तस्मै प्रतिवच: सा तु भर्त्रे न प्रददौ तदा।
कराभ्यां तेन विप्रेण स्पृष्टा भर्तृव्रता सती॥ ६०॥
उच्छिष्टास्मीति मन्वाना लज्जिता भर्तुरेव च।
तूष्णीं भूताभवत् साध्वी न चोवाचाथ किंचन॥ ६१॥
 
 
अनुवाद
परन्तु ओघवती ने उस समय अपने पति को कोई उत्तर नहीं दिया। अतिथि रूप में आये ब्राह्मण ने उसे दोनों हाथों से स्पर्श किया था। इससे उस पतिव्रता स्त्री को अपने पति के प्रति भी लज्जा हुई और वह स्वयं को अपवित्र समझकर चुप हो गई। वह कुछ भी न बोल सकी। 60-61.
 
But Oghavati did not reply to her husband at that time. The Brahmin who had come as a guest had touched her with both his hands. Due to this, the chaste and faithful wife felt ashamed of her husband as well, considering herself polluted; that is why the chaste lady became quiet. She could not say anything. 60-61.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)