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श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 2: प्रजापति मनुके वंशका वर्णन, अग्निपुत्र सुदर्शनका अतिथिसत्काररूपी धर्मके पालनसे मृत्युपर विजय पाना  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  13.2.58 
अथेध्मानमुपादाय स पावकिरुपागमत्।
मृत्युना रौद्रभावेन नित्यं बन्धुरिवान्वित:॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
इसी बीच अग्निकुमार सुदर्शन लकड़ी लेकर लौट आये। मृत्यु उनके पीछे क्रूर भाव से चल रही थी, मानो कोई प्रिय मित्र अपने प्रिय मित्र के पीछे चल रहा हो। 58.
 
Meanwhile Agnikumar Sudarshan returned with firewood. Death was always following him with cruel feelings, as if a loving friend was following his dear friend. 58.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)