vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 13: अनुशासन पर्व
»
अध्याय 2: प्रजापति मनुके वंशका वर्णन, अग्निपुत्र सुदर्शनका अतिथिसत्काररूपी धर्मके पालनसे मृत्युपर विजय पाना
»
श्लोक 50
श्लोक
13.2.50
आतिथ्यं कृतमिच्छामि त्वयाद्य वरवर्णिनि।
प्रमाणं यदि धर्मस्ते गृहस्थाश्रमसम्मत:॥ ५०॥
अनुवाद
वरवर्णिनी! यदि आप गृहस्थ धर्म को स्वीकार करने योग्य मानती हैं, तो आज मैं आपके द्वारा किया गया आतिथ्य स्वीकार करना चाहता हूँ ॥50॥
Varavarnini! If you consider the Dharma of a householder acceptable, then today I would like to accept the hospitality offered by you. ॥ 50॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×