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mahabharat 13.2.50: वरवर्णिनी! यदि आप गृहस्थ धर्म को स्वीकार करने योग्य मानती हैं, तो आज मैं आपके द्वारा किया गया आतिथ्य स्वीकार करना चाहता हूँ ॥50॥   |   mahabharat अध्याय 13.2: प्रजापति मनुके वंशका वर्णन, अग्निपुत्र सुदर्शनका अतिथिसत्काररूपी धर्मके पालनसे मृत्युपर विजय पाना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 2: प्रजापति मनुके वंशका वर्णन, अग्निपुत्र सुदर्शनका अतिथिसत्काररूपी धर्मके पालनसे मृत्युपर विजय पाना  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  13.2.50 
आतिथ्यं कृतमिच्छामि त्वयाद्य वरवर्णिनि।
प्रमाणं यदि धर्मस्ते गृहस्थाश्रमसम्मत:॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
वरवर्णिनी! यदि आप गृहस्थ धर्म को स्वीकार करने योग्य मानती हैं, तो आज मैं आपके द्वारा किया गया आतिथ्य स्वीकार करना चाहता हूँ ॥50॥
 
Varavarnini! If you consider the Dharma of a householder acceptable, then today I would like to accept the hospitality offered by you. ॥ 50॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)