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mahabharat 13.2.45: ‘वामोरु शोभने! यदि तुम मेरे वचन स्वीकार करते हो, तो मेरे इस वचन को सदैव शांतचित्त होकर अपने हृदय में धारण करो। 45॥   |   mahabharat अध्याय 13.2: प्रजापति मनुके वंशका वर्णन, अग्निपुत्र सुदर्शनका अतिथिसत्काररूपी धर्मके पालनसे मृत्युपर विजय पाना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 2: प्रजापति मनुके वंशका वर्णन, अग्निपुत्र सुदर्शनका अतिथिसत्काररूपी धर्मके पालनसे मृत्युपर विजय पाना  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  13.2.45 
प्रमाणं यदि वामोरु वचस्ते मम शोभने।
इदं वचनमव्यग्रा हृदि त्वं धारये: सदा॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
‘वामोरु शोभने! यदि तुम मेरे वचन स्वीकार करते हो, तो मेरे इस वचन को सदैव शांतचित्त होकर अपने हृदय में धारण करो। 45॥
 
‘Vamoru Shobhane! If you accept my words, then always keep this statement of mine in your heart with peace of mind. 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)