Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.19.58-59h: हे पाण्डुपुत्र! उन्हें देखते ही मैं उनके चरणों पर गिर पड़ा। तब पिता जी ने भी लकड़ी आदि सामान एक ओर रखकर मुझे गले लगा लिया और मेरा माथा सूंघकर नेत्रों से आँसू बहाते हुए मुझसे कहा- 'पुत्र! यह बड़े सौभाग्य की बात है कि तुम विद्वान होकर घर लौटे हो और मैंने तुम्हें अपनी आँखों से देखा है।' 58 1/2 | mahabharat अध्याय 13.19: शिवसहस्रनामके पाठकी महिमा तथा ऋषियोंका भगवान् शंकरकी कृपासे अभीष्ट सिद्धि होनेके विषयमें अपना-अपना अनुभव सुनाना और श्रीकृष्णके द्वारा भगवान् शिवजीकी महिमाका वर्णन । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
तान् विसृज्य च मां प्राह पिता सास्राविलेक्षण:।
प्रणमन्तं परिष्वज्य मूर्ध्न्युपाघ्राय पाण्डव॥ ५८॥
दिष्ट्या दृष्टोऽसि मे पुत्र कृतविद्य इहागत:।
अनुवाद
हे पाण्डुपुत्र! उन्हें देखते ही मैं उनके चरणों पर गिर पड़ा। तब पिता जी ने भी लकड़ी आदि सामान एक ओर रखकर मुझे गले लगा लिया और मेरा माथा सूंघकर नेत्रों से आँसू बहाते हुए मुझसे कहा- 'पुत्र! यह बड़े सौभाग्य की बात है कि तुम विद्वान होकर घर लौटे हो और मैंने तुम्हें अपनी आँखों से देखा है।' 58 1/2
O son of Pandu! As soon as I saw him I fell at his feet. Then father also put aside the firewood and other things and embraced me and smelled my forehead and with tears flowing from his eyes said to me- 'Son! It is a matter of great fortune that you have returned home as a scholar and I have seen you with my own eyes.' 58 1/2
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥