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श्लोक 13.19.27  |
अजरश्चामरश्चैव भविता दु:खवर्जित:।
साम्यं ममास्तु ते सौख्यं युवयोर्वर्धतां क्रतु:॥ २७॥ |
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| अनुवाद |
| ‘मुनि! तुम अमर हो जाओगे और शोक से मुक्त हो जाओगे। तुम मेरी समानता को प्राप्त हो जाओ और तुम दोनों का, यजमान और पुरोहित का यह यज्ञ सदैव बढ़ता रहे।’॥27॥ |
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| ‘Muni! You will become immortal and free from sorrow. May you attain my likeness and may this yajna of you two, the yajman and the priest, continue to grow forever.’॥ 27॥ |
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