श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 19: शिवसहस्रनामके पाठकी महिमा तथा ऋषियोंका भगवान‍् शंकरकी कृपासे अभीष्ट सिद्धि होनेके विषयमें अपना-अपना अनुभव सुनाना और श्रीकृष्णके द्वारा भगवान‍् शिवजीकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 16-17h
 
 
श्लोक  13.19.16-17h 
विश्वामित्रस्तदोवाच क्षत्रियोऽहं तदाभवम्।
ब्राह्मणोऽहं भवानीति मया चाराधितो भव:॥ १६॥
तत्प्रसादान्मया प्राप्तं ब्राह्मण्यं दुर्लभं महत्।
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् विश्वामित्र बोले, 'हे राजन! जब मैं क्षत्रिय था, तभी मैंने ब्राह्मण बनने का दृढ़ निश्चय किया था। इसी उद्देश्य से मैंने भगवान शंकर की आराधना की थी। और उनकी कृपा से मुझे ब्राह्मण का अत्यंत दुर्लभ पद प्राप्त हुआ।'॥16 1/2॥
 
Thereafter Vishwamitra said, 'O King! It was in the days when I was a Kshatriya that I firmly resolved to become a Brahmin. With this objective in mind, I worshipped Lord Shankar. And by his grace, I attained the very rare status of a Brahmin.'॥ 16 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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