श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 189: भीष्मजीका प्राणत्याग, धृतराष्ट्र आदिके द्वारा उनका दाह-संस्कार, कौरवोंका गंगाके जलसे भीष्मको जलांजलि देना, गंगाजीका प्रकट होकर पुत्रके लिये शोक करना और श्रीकृष्णका उन्हें समझाना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  13.189.35 
न शक्ता विनिहन्तुं हि रणे तं सर्वदेवता:।
तस्मान्मा त्वं सरिच्छ्रेष्ठे शोचस्व कुरुनन्दनम्।
वसूनेष गतो देवि पुत्रस्ते विज्वरा भव॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
हे नदियों में श्रेष्ठ देवि! समस्त देवता मिलकर भी उसे युद्ध में मारने की शक्ति नहीं रखते थे। अतः तुम कुरुपुत्र भीष्म के लिए शोक मत करो। तुम्हारे पुत्र भीष्म ने वसुओं का रूप प्राप्त कर लिया है। अतः तुम उनके लिए चिन्ता से मुक्त हो जाओ।॥ 35॥
 
O best of the rivers, Goddess! Even all the gods combined did not have the power to kill him in battle. Therefore, do not grieve for Bheeshma, the son of Kuru. Your son Bheeshma has attained the form of the Vasus. Therefore, be free from worries for him.'॥ 35॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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