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mahabharat 13.189.25-26h: "हे राजन! मेरा हृदय निश्चय ही पत्थर और लोहे का बना है, तभी तो आज भी अपने प्रिय पुत्र को जीवित न देखकर भी नहीं फटता। 25 1/2.   |   mahabharat अध्याय 13.189: भीष्मजीका प्राणत्याग, धृतराष्ट्र आदिके द्वारा उनका दाह-संस्कार, कौरवोंका गंगाके जलसे भीष्मको जलांजलि देना, गंगाजीका प्रकट होकर पुत्रके लिये शोक करना और श्रीकृष्णका उन्हें समझाना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 189: भीष्मजीका प्राणत्याग, धृतराष्ट्र आदिके द्वारा उनका दाह-संस्कार, कौरवोंका गंगाके जलसे भीष्मको जलांजलि देना, गंगाजीका प्रकट होकर पुत्रके लिये शोक करना और श्रीकृष्णका उन्हें समझाना  »  श्लोक 25-26h
 
 
श्लोक  13.189.25-26h 
अश्मसारमयं नूनं हृदयं मम पार्थिवा:॥ २५॥
अपश्यन्त्या: प्रियं पुत्रं यन्न दीर्यति मेऽद्य वै।
 
 
अनुवाद
"हे राजन! मेरा हृदय निश्चय ही पत्थर और लोहे का बना है, तभी तो आज भी अपने प्रिय पुत्र को जीवित न देखकर भी नहीं फटता। 25 1/2.
 
"O king! My heart is certainly made of stone and iron, that is why it does not burst even today on not seeing my beloved son alive. 25 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)