श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 189: भीष्मजीका प्राणत्याग, धृतराष्ट्र आदिके द्वारा उनका दाह-संस्कार, कौरवोंका गंगाके जलसे भीष्मको जलांजलि देना, गंगाजीका प्रकट होकर पुत्रके लिये शोक करना और श्रीकृष्णका उन्हें समझाना  »  श्लोक 15-18h
 
 
श्लोक  13.189.15-18h 
ततोऽस्य विधिवच्चक्रु: पितृमेधं महात्मन:॥ १५॥
यजनं बहुशश्चाग्नौ जगु: सामानि सामगा:।
ततश्चन्दनकाष्ठैश्च तथा कालीयकैरपि॥ १६॥
कालागुरुप्रभृतिभिर्गन्धैश्चोच्चावचैस्तथा।
समवच्छाद्य गाङ्गेयं सम्प्रज्वाल्य हुताशनम्॥ १७॥
अपसव्यमकुर्वन्त धृतराष्ट्रमुखाश्चिताम्।
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् पाण्डवों ने महात्मा भीष्म का विधिपूर्वक पितृमेध संस्कार किया। अग्नि में अनेक आहुति दी गईं। स्तुतिगान करने वाले ब्राह्मणों ने स्तुतिगान आरम्भ किया और धृतराष्ट्र आदि ने भीष्म के शरीर पर चंदन, काला चंदन तथा सुगंधित द्रव्यों का लेप करके उनकी चिता में अग्नि प्रज्वलित की। तत्पश्चात् धृतराष्ट्र तथा सभी कौरवों ने उस जलती हुई चिता की परिक्रमा की। 15-17 1/2
 
Thereafter, the Pandavas ritually performed the Pitramedha ritual of Mahatma Bhishma. Many sacrifices were made in the fire. The brahmins singing the hymns started singing hymns and Dhritarashtra etc. covered Bhishma's body with sandalwood, black sandalwood and fragrant things and set his funeral pyre on fire. Then Dhritarashtra and all the Kauravas circumambulated this burning pyre. 15-17 1/2
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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